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Thursday, October 8, 2020

अपनापन और लगाव

एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था।*
*जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता।*
*पेड के उपर चढ़ता,आम खाता,खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता।*
*उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया।*
*बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया।*
*कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया।*
*आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता।*
*एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा,*
*"तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।"*
*बच्चे ने आम के पेड से कहा,*
*"अब मेरी खेलने की उम्र नही है*
*मुझे पढना है,लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।"*
*पेड ने कहा,*
*"तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे,*
*इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।"*
*उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया।*
*उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया।*
*आम का पेड उसकी राह देखता रहता।*
*एक दिन वो फिर आया और कहने लगा,*
*"अब मुझे नौकरी मिल गई है,*
*मेरी शादी हो चुकी है,*
*मुझे मेरा अपना घर बनाना है,इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।"*
*आम के पेड ने कहा,*
*"तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,उससे अपना घर बना ले।"*
*उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।*
*आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था।*
*कोई उसे देखता भी नहीं था।*
*पेड ने भी अब वो बालक/जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड दी थी।*
*फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा,*
*"शायद आपने मुझे नही पहचाना,*
*मैं वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।"*
*आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा,*
*"पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकु।"*
*वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा,*
*"आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है,*
*आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।"*
*इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।*
*वो आम का पेड़ कोई और नही हमारे माता-पिता हैं दोस्तों ।*
*जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था।*
*जैसे-जैसे बडे होते चले गये उनसे दुर होते गये।*
*पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी,*
*कोई समस्या खडी हुई।*
*आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है।*
*जाकर उनसे लिपटे,*
*उनके गले लग जाये*
*फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा।*
**आप से प्रार्थना करता हूँ यदि ये कहानी अच्छी लगी हो तो कृपया ज्यादा से ज्यादा लोगों को भेजे ता *कि किसी की औलाद सही रास्ते पर आकर अपने माता पिता को गले लगा सके !*
आप सभी स्वस्थ रहें मस्त रहें मुस्कुराते रहें एवं जीवन के हर एक पल को एक नए उत्साह उमंग एवं आनंद के साथ सकारात्मक रूप से जीने का प्रयास करते रहे.

बन्धन

*एक बार अर्जुन ने कृष्ण से पूछा-*
*माधव.. ये 'सफल जीवन' क्या होता है ?*

*कृष्ण अर्जुन को पतंग  उड़ाने ले गए।*
*अर्जुन कृष्ण  को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था.*

*थोड़ी देर बाद अर्जुन बोला-*

*माधव.. ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें ? ये और ऊपर चली जाएगी|*

*कृष्ण ने धागा तोड़ दिया ..*

*पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...*

*तब कृष्ण ने अर्जुन को जीवन का दर्शन समझाया...*
*पार्थ..  'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..*
*हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं; जैसे :*
            *-घर-*
        *-परिवार-*
      *-अनुशासन-*
    *-माता-पिता-*
       *-गुरू-और-*
          *-समाज-*

*और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...*

*वास्तव में यही वो धागे होते हैं - जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..*

*इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो बिन धागे की पतंग का हुआ...'*

*अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."*

*धागे और पतंग जैसे जुड़ाव* *के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन कहते हैं..!!*"

खाली अंतर्मन

*एक सन्यासी घूमते-फिरते एक दुकान पर आये | दुकान में अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे |*

*सन्यासी ने  एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए दुकानदार" से पूछा, "इसमें क्या है?"* 

*दुकानदार ने कहा, "इसमें नमक है।"*

*सन्यासी ने फिर पूछा, "इसके पास वाले में क्या है ?"*

*दुकानदार ने कहा, "इसमें हल्दी है।"*

*इसी प्रकार सन्यासी पूछ्ते गए और दुकानदार बतलाता रहा।*

*अंत मे पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया, सन्यासी ने पूछा, "उस अंतिम डिब्बे में क्या है?"*

*दुकानदार बोला, "उसमें श्रीकृष्ण हैं।"*

*सन्यासी ने हैरान होते हुये पूछा, "श्रीकृष्ण !! भला यह "श्रीकृष्ण" किस वस्तु का नाम है भाई? मैंने तो इस नाम के किसी सामान के बारे में कभी नहीं सुना !"*

*दुकानदार सन्यासी के भोलेपन पर हंस कर बोला, "महात्मन! और डिब्बों मे तो भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं | पर यह डिब्बा खाली है| हम खाली को खाली नहीं कहकर 'श्रीकृष्ण' कहते हैं !"*
 
*संन्यासी की आंखें खुली की खुली रह गई ! जिस बात के लिये मैं दर-दर भटक रहा था, वो बात उसे आज, एक व्यापारी से समझ आ रही है।* वह सन्यासी उस छोटे से किराने के दुकानदार के चरणों में गिर पड़ा, *ओह, तो खाली में श्रीकृष्ण रहता है !*

*सत्य है! भरे हुए में श्रीकृष्ण को स्थान कहाँ?*

*काम, क्रोध, लोभ, मोह, लालच, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष और भली-बुरी, सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय आदि बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा?*

परमात्मा की व्यवस्था

*यही जीवन है....*

कुछ लोग अपनी पढाई 22 साल की उम्र में पुर्ण कर लेते हैं मगर उनको कई सालों तक कोई अच्छी नौकरी नहीं मिलती, 

कुछ लोग 25 साल की उम्र में किसी कंपनी के सीईओ बन जाते हैं और 50 साल की उम्र में हमें पता चलता है वह नहीं रहे, 

जबकि कुछ लोग 50 साल की उम्र में सीईओ बनते हैं और 90 साल तक आनंदित रहते हैं,

बेहतरीन रोज़गार होने के बावजूद कुछ लोग अभी तक ग़ैर शादीशुदा है और कुछ लोग बग़ैर रोज़गार के भी शादी कर चुके हैं और रोज़गार वालों से ज़्यादा खुश हैं,

बराक ओबामा 55 साल की उम्र में रिटायर हो गये जबकि ट्रंप 70 साल की उम्र में शुरुआत करते है, 

कुछ लीजेंड परीक्षा में फेल हो जाने पर भी मुस्कुरा देते हैं और कुछ लोग एक नंबर कम आने पर भी रो देते हैं, 

किसी को बग़ैर कोशिश के भी बहुत कुछ मिल गया और कुछ सारी ज़िंदगी बस एड़ियां ही रगड़ते रहे,

इस दुनिया में हर शख़्स अपने टाइम ज़ोन की बुनियाद पर काम कर रहा है, 

ज़ाहिरी तौर पर हमें ऐसा लगता है कुछ लोग हमसे बहुत आगे निकल चुके हैं,
और शायद ऐसा भी लगता हो कुछ हमसे अभी तक पीछे हैं, 

लेकिन हर व्यक्ति अपनी अपनी जगह ठीक है अपने अपने वक़्त के मुताबिक़....!!

किसी से भी अपनी तुलना मत कीजिए..

अपने टाइम ज़ोन में रहें
इंतज़ार कीजिए और
इत्मीनान रखिए...

ना ही आपको देर हुई है और ना ही जल्दी, 

परमपिता परमेश्वर ने हम सबको अपने हिसाब से डिजा़इन किया है वह जानता है कौन कितना बोझ उठा सकता है किस को किस वक़्त क्या देना है, 

विश्वास रखिए भगवान की ओर से हमारे लिए जो फैसला किया गया है वह सर्वोत्तम ही है।

हिंदी का चमत्कार

*ये चमत्कार हिंदी में ही हो सकता है …!!*
🙏🙏🥰🙏🙏💘

*चार मिले चौसठ खिले, बीस रहे कर जोड़!*
*प्रेमी-प्रेमी दो मिले, खिल गए सात करोड़!!*

मुझसे एक बुजुर्गवार ने इस कहावत का अर्थ पूछा। 🙏
काफी सोच-विचार के बाद भी जब मैं बता नहीं पाया, तब मैंने कहा – बाबा आप ही बताइए, मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा।

तब एक रहस्यमयी😍 मुस्कान के साथ बाबा समझाने लगे – 

देखो भाग्यवान, यह बड़े रहस्य की बात है – *चार मिले –* मतलब जब भी कोई मिलता है, तो सबसे पहले आपस में दोनों की आंखें मिलती हैं।👁️👃👁️ इसलिए कहा, चार मिले।

फिर कहा, *चौसठ खिले –*🤩 यानि बत्तीस-बत्तीस दांत – दोनों के मिलाकर चौसठ हो गए – इस तरह “चार मिले, चौसठ खिले” – हुआ!

*“बीस रहे कर जोड़”*🙏🙏 – दोनों हाथों की दस उंगलियां – दोनों व्यक्तियों की 20 हुईं – बीसों मिलकर ही एक-दूसरे को प्रणाम की मुद्रा में हाथ बरबस उठ ही जाते हैं!

वैसे तो शरीर में रोम की गिनती करना असम्भव है,🤷🏻‍♂️ लेकिन मोटा-मोटा अर्थात् अनुमानतः साढ़े तीन करोड़ कहते हैं कहने वाले। तो कवि ने अंतिम रहस्य भी प्रकट कर दिया *– “प्रेमी प्रेमी दो मिले – खिल गए सात करोड़!”*

ऐसा अंतर्हृदय में बसा हुआ प्रिय व्यक्ति जब कोई मिलता है, तो रोम-रोम खिलना स्वाभाविक ही है भाई।

जैसे ही कोई ऐसा मिलता है, तो कवि ने अंतिम पंक्ति में पूरा रस निचोड़ दिया – *“खिल गए सात करोड़”* यानि हमारा रोम-रोम खिल जाता है!

भई वाह, आनंद आ गया। हमारी हिंदी कहावतों में कितना सार छुपा है। एक-एक शब्द चाशनी में डूबा हुआ। 

🙏🙏🙏🙏

Sunday, October 4, 2020

विश्वास believe विश्वास trust

*विश्वास (believe) तथा विश्वास (trust) में अंतर*

*एक बार, दो बहुमंजिली इमारतों के बीच, बंधी हुई एक तार पर लंबा सा बाँस पकड़े, एक नट चल रहा था । उसने अपने कन्धे पर अपना बेटा बैठा रखा था ।*

*सैंकड़ों, हज़ारों लोग दम साधे देख रहे थे। सधे कदमों से, तेज हवा से जूझते हुए, अपनी और अपने बेटे की ज़िंदगी दाँव पर लगाकर, उस कलाकार ने दूरी पूरी कर ली ।*

*भीड़ आह्लाद से उछल पड़ी, तालियाँ, सीटियाँ बजने लगी ।।*

*लोग उस कलाकार की फोटो खींच रहे थे, उसके साथ सेल्फी ले रहे थे। उससे हाथ मिला रहे थे । वो कलाकार माइक पर आया, भीड़ को बोला, "क्या आपको विश्वास है कि मैं यह दोबारा भी कर सकता हूँ ??"*

*भीड़ चिल्लाई, "हाँ हाँ, तुम कर सकते हो ।"*

*उसने पूछा, क्या आपको विश्वास है,भीड़ चिल्लाई हाँ पूरा विश्वास है, हम तो शर्त भी लगा सकते हैं कि तुम सफलता पूर्वक इसे दोहरा भी सकते हो।*

*कलाकार बोला, पूरा पूरा विश्वास है ना*

*भीड़ बोली, हाँ हाँ*

*कलाकार बोला, "ठीक है, कोई मुझे अपना बच्चा दे दे, मैं उसे अपने कंधे पर बैठा कर रस्सी पर चलूँगा ।"*

*खामोशी, शांति, चुप्पी फैल गयी।*

*कलाकार बोला, "डर गए...!" अभी तो आपको विश्वास था कि मैं कर सकता हूँ। असल मे आप का यह विश्वास (believe) है, मुझमेँ विश्वास (trust) नहीं है।दोनों विश्वासों में फर्क है साहेब!*

*यही कहना है, "ईश्वर हैं !" ये तो विश्वास है! परन्तु ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास नहीं है ।*

*You believe in God, but you don't trust him.*

*अगर ईश्वर में पूर्ण विश्वास है तो चिंता, क्रोध, तनाव क्यों ???   जरा सोचिए !!!*
🙏🙏जय माता दी🙏🙏

जिंदगी

*✍..खुश रहकर गुजारो,तो मस्त है जिदंगी,!*
*दुखी रहकर गुजारो,तो त्रस्त है जिंदगी!*
*तुलना में गुजारो,तो पस्त है जिंदगी!*
*इतंजार में गुजारो, तो सुस्त है जिंदगी!*
*सीखने में गुजारो,तो किताब है जिंदगी!*
*दिखावे में गुजारो,तो बर्बाद है जिदंगी!* 
*मिलती है एक बार,प्यार से बिताओ जिदंगी!*
*जन्म तो रोज होते हैं,यादगार बनाओ जिंदगी!!*
*🌹जय माता दी🌹*👏

Tuesday, September 29, 2020

जिंदगी

*✍..खुश रहकर गुजारो,तो मस्त है जिदंगी,!*
*दुखी रहकर गुजारो,तो त्रस्त है जिंदगी!*
*तुलना में गुजारो,तो पस्त है जिंदगी!*
*इतंजार में गुजारो, तो सुस्त है जिंदगी!*
*सीखने में गुजारो,तो किताब है जिंदगी!*
*दिखावे में गुजारो,तो बर्बाद है जिदंगी!* 
*मिलती है एक बार,प्यार से बिताओ जिदंगी!*
*जन्म तो रोज होते हैं,यादगार बनाओ जिंदगी!!*
*🌹जय माता दी🌹*👏

राम औऱ रावण

*श्रीराम ने रामेश्वरम ने जब शिवलिंग की स्थापना की तब आचार्यत्व के लिए महापंडित रावण को निमंत्रित किया था...*

रावण ने उस निमंत्रण को स्वीकार किया और उस अनुष्ठान का आचार्य बना । रावण त्रिकालज्ञ था, उसे पता था कि उसकी मृत्यु सिर्फ श्रीराम के हाथों लिखी है । वह कुछ भी दक्षिणा माँग सकता था ।पर उसने क्या विचित्र दक्षिणा माँगी वह भी इस लेख में पढ़िए >>> 

रावण केवल शिव भक्त, विद्वान एवं महावीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था... उसेभविष्य का पता था... वह जानता था कि रामसे जीत पाना उसके लिए असंभव था... 
जामवंत जी को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेज गया... जामवन्त दीर्घाकार थे । पहले हनुमान, फिर अंगद और अब जामवन्तजी । यह भयानक समाचार विद्युत वेग की भाँति पूरी लंकानगरी में फैल गया । इस घबराहट से सबके हृदय की धड़कनें लगभग बैठ सी गई । जामवन्त देखने में हनुमान और अंगद से अधिक ही भयावह थे ।सागर सेतु लंका मार्ग प्रायः सुनसान मिला । कहीं-कहीं कोई मिले भी तो वे डर के मारे बिना पूछे राजपथ की ओर संकेत कर देते... बोलने का किसी में साहस नहीं था । प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे । इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा । यह समाचार द्वारपाल ने लगभग दौड़कर रावण तक पहुँचाया । स्वयं रावण उन्हें राजद्वार तक लेने आए । रावण को अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मै अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ । मैं वनवासी श्रीराम का दूत बनकर आया हूँ । उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहाँ है । रावण ने सविनय कहा – आप हमारे पितामह के भाई हैं, इस नाते आप हमारे पूज्य हैं । आप कृपया आसन ग्रहण करें । यदि आप मेंरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा । जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की । उन्होंने आसन ग्रहण किया । रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया । 
तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः कहाँ कि वनवासी श्रीराम ने तुम्हें प्रणाम कहा है । वे सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्वर-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं । 
*इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव महापंडित रावण को आचार्य पद पर वरण करने की इच्छा  प्रकट की है । मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ ।* 
रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया कि क्या श्रीराम द्वारा महेश्वर-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जारहा है ? 
बिल्कुल ठीक । श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है । जामवन्त बोले ।

प्रहस्त आँख तरेरते हुए गुर्राया – अत्यंत धृष्टता, नितांत निर्लज्जता । लंकेश्वर ऐसा प्रस्ताव कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे ।मातुल ! तुम्हें किसने मध्यस्थता करने को कहा ? लंकेश ने कठोर स्वर में फटकार दिया । जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है । क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दिया । 
लेकिन हाँ । यह जाँच तो नितांत आवश्यक है ही कि जब वनवासी राम ने इतना बड़ा आचार्य पद पर पदस्थ होने हेतु आमंत्रित किया है तब वह भी यजमान पद हेतु उचित अधिकारी है भी अथवा नहीं । 
जामवंत जी ! आप जानते ही हैं कि त्रिभुवन विजयी अपने इस शत्रु की लंकापुरी में आप पधारे हैं । यदि हम आपको यहाँ बंदी बना लें और आपको यहाँ से लौटने न दें तो आप क्या करेंगे ? जामवंत खुलकर हँसे । मुझे निरुद्ध करने की शक्ति समस्त लंका के दानवों के संयुक्त प्रयास में नहीं है, किन्तु मुझे किसी भी प्रकार की कोई विद्वत्ता प्रकट करने की न तो अनुमति है और न ही आवश्यकता । ध्यान रहे, मैं अभी एक ऐसे उपकरण के साथ यहां विद्यमान हूँ, जिसके माध्यम से धनुर्धारी लक्ष्मण यह दृश्यवार्ता स्पष्ट रूप से देख-सुन रहे हैं । जब मैं वहाँ से चलने लगा था तभी धनुर्वीर लक्ष्मण वीरासन में बैठे हुए हैं । उन्होंने आचमन करके अपने त्रोण से पाशुपतास्त्र निकाल कर संधान कर लिया है और मुझसे कहा है कि जामवन्त ! रावण से कह देना कि यदि आप में से किसी ने भी मेरा विरोध प्रकट करने की चेष्टा की तो यह पाशुपतास्त्र समस्त दानव कुल के संहार का संकल्प लेकर तुरन्त छूट जाएगा । इस कारण भलाई इसी में है कि आप मुझे अविलम्ब वांछित प्रत्युत्तर के साथ सकुशल और आदर सहित धनुर्धर लक्ष्मण के दृष्टिपथ तक वापस पहुँचने की व्यवस्था करें । 
उपस्थित दानवगण भयभीत हो गए । प्रहस्थ का शरीर पसीने से लथपथ हो गया । लंकेश तक काँप उठे । पाशुपतास्त्र ! महेश्वर का यह अमोघ अस्त्र तो सृष्टि में एक साथ दो धनुर्धर प्रयोग ही नहीं कर सकते । अब भले ही वह रावण मेघनाथ के त्रोण में भी हो । जब लक्ष्मण ने उसे संधान स्थिति में ला ही दिया है, तब स्वयं भगवान शिव भी अब उसे उठा नहीं सकते । उसका तो कोई प्रतिकार है ही नहीं । 
रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा – आप पधारें । यजमान उचित अधिकारी है । उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है । श्रीराम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया। 

जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे ।
जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी श्रीराम के पास क्या है और क्या होना चाहिए । अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना से समुद्र तट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है । यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है । तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं । विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना । ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी । अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना । 
स्वामी का आचार्य अर्थात् स्वयं का आचार्य । यह जान जानकीजी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया । 
स्वस्थ कण्ठ से सौभाग्यवती भव कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया ।सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरा । आदेश मिलने पर आना कहकर सीता को उसने विमान में ही छोड़ा और स्वयं श्रीराम के सम्मुख पहुँचा । 
जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे । सम्मुख होते ही वनवासी राम ने आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया । 
दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया । 
सुग्रीव ही नहीं विभीषण की भी उसने उपेक्षा कर दी । जैसे वे वहाँ हों ही नहीं ।भूमि शोधन के उपरान्त आचार्य रावण ने कहा कि यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें । 
श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं । 
अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं । यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था । इन सबके अतिरिक्त तुम सन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है । इन परिस्थितियों में पत्नी रहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ? 
कोई उपाय आचार्य ? आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं । स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं । 
श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया ।
श्री रामादेश के परिपालन में विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे । अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान । आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया ।

गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा लिंग विग्रह ? 
यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं । अभी तक लौटे नहीं हैं । आते ही होंगे । 
आचार्य ने आदेश दे दिया विलम्ब नहीं किया जा सकता । उत्तम मुहूर्त उपस्थित है । इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालुका-लिंग-विग्रह स्वयं बना ले । 
जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित की ।
 यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया । 
श्रीसीतारामने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया । आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया ।

अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की...
राम ने पूछा आपकी दक्षिणा? 
पुनःएक बार सभी को चौंकाया आचार्य के शब्दों ने - घबराओ नहीं यजमान !  स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती । आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है, लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य कि जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है ।आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे । आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी । 
ऐसा ही होगा आचार्य । यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी ।
 *रघुकुल रीति सदा चली आई । प्राण जाई पर वचन न जाई ।*
यह दृश्य वार्ता देख सुनकर सभी ने उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए । सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया । रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी ? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु श्रीराम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, व श्रीराम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है ? 
बहुत कुछ हो सकता था... काश ! श्रीराम को वनवास न होता...  काश ! सीता वन न जाती... किन्तु ये धरती तो है ही पाप भुगतने वालों के लिए और जो यहाँ आया है उसे अपने पाप भुगतने होंगे और इसलिए रावण जैसा पापी लंका का स्वामी तो हो सकता है देवलोक का नहीं । 
वह तपस्वी महापंडित रावण जिसे मिला था-ब्रह्मा से विद्वता और अमरता का वरदान... शिव भक्ति से पाया शक्ति का वरदान... 
चारों वेदों का ज्ञाता, ज्योतिष विद्या मे पारंगत, अपने घर की वास्तु शांति हेतु आचार्य रूप में जिसे-भगवन शंकर ने किया आमंत्रित... शिव भक्त रावण-रामेश्वरम में शिवलिंग पूजा हेतु अपने शत्रु प्रभु श्रीराम का जिसने स्वीकार किया निमंत्रण...

नवरात्रि पर्व उपवास

*नवरात्र‍ि में कर रहे हैं व्रत, तो सेहत को होंगे ये 8 फायदे* 
 
1 नवरात्रि में व्रत रखने पर ऐसे लोग भी जल्दी उठते हैं, जिन्हें रोजाना देर तक सोने की आदत होती है। लगातार 9 दिन तक ऐसा करने पर इसका असर आपके शरीर, ऊर्जा और मानसिक सेहत पर सकारात्मक रूप से पड़ता है।
2 व्रत के साथ पूजा-पाठ की जाती है, जो मानसिक शांति और तनाव कम करने में मददगार होता है। इससे आपका मानसिक स्तर सुधरता है, साथ ही आप प्रसन्न रहते हैं।
3 खाने पीने में परहेज करने का असर भी आपकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ता है। इन दिनों आप नमक और अन्य कैलोरी फूड नहीं खाते और फल, दूध एवं जूस का सेवन ज्यादा करते हैं जिससे आपका वजन नियंत्रित होता है।
4 फलाहार और तरल पदार्थों का सेवन पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है, जिसे आपको कब्ज, गैस और अपच जैसी समस्याओं से राहत मिलती है।
5 व्रत में आप शराब, सिगरेट एवं अन्य धूम्रपान संबधी चीजों का सेवन नहीं करते, जिससे आपकी बिगड़ती सेहत पर कंट्रोल होता है, और नुकसान से भी बचते हैं।
6 व्रत रखने से शरीर के अंदर से कोलेस्ट्राल की मात्रा कम होती है, जिससे आपकी बॉडी के साथ ही दिल और बाकी अंगों की फिटनेस बढ़ती है।
7 इन दिनों में तापमान अधिक होता है और प्यास भी ज्यादा लगती है। ऐसे में जब आप भरपूर पानी और तरल पदार्थों का सेवन करते हैं तो डिहाइड्रेशन नहीं होता और आप ज्यादा फ्रेश रहते हैं।
8 इन दिनों आप आध्यात्मिक होते हैं। आध्यात्‍म का आपकी मानसिक और आत्मिक सेहत में वृद्धि होती है और आपको अतिरिक्त ऊर्जा का एहसास होता है।