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Tuesday, September 29, 2020

जिंदगी

*✍..खुश रहकर गुजारो,तो मस्त है जिदंगी,!*
*दुखी रहकर गुजारो,तो त्रस्त है जिंदगी!*
*तुलना में गुजारो,तो पस्त है जिंदगी!*
*इतंजार में गुजारो, तो सुस्त है जिंदगी!*
*सीखने में गुजारो,तो किताब है जिंदगी!*
*दिखावे में गुजारो,तो बर्बाद है जिदंगी!* 
*मिलती है एक बार,प्यार से बिताओ जिदंगी!*
*जन्म तो रोज होते हैं,यादगार बनाओ जिंदगी!!*
*🌹जय माता दी🌹*👏

राम औऱ रावण

*श्रीराम ने रामेश्वरम ने जब शिवलिंग की स्थापना की तब आचार्यत्व के लिए महापंडित रावण को निमंत्रित किया था...*

रावण ने उस निमंत्रण को स्वीकार किया और उस अनुष्ठान का आचार्य बना । रावण त्रिकालज्ञ था, उसे पता था कि उसकी मृत्यु सिर्फ श्रीराम के हाथों लिखी है । वह कुछ भी दक्षिणा माँग सकता था ।पर उसने क्या विचित्र दक्षिणा माँगी वह भी इस लेख में पढ़िए >>> 

रावण केवल शिव भक्त, विद्वान एवं महावीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था... उसेभविष्य का पता था... वह जानता था कि रामसे जीत पाना उसके लिए असंभव था... 
जामवंत जी को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेज गया... जामवन्त दीर्घाकार थे । पहले हनुमान, फिर अंगद और अब जामवन्तजी । यह भयानक समाचार विद्युत वेग की भाँति पूरी लंकानगरी में फैल गया । इस घबराहट से सबके हृदय की धड़कनें लगभग बैठ सी गई । जामवन्त देखने में हनुमान और अंगद से अधिक ही भयावह थे ।सागर सेतु लंका मार्ग प्रायः सुनसान मिला । कहीं-कहीं कोई मिले भी तो वे डर के मारे बिना पूछे राजपथ की ओर संकेत कर देते... बोलने का किसी में साहस नहीं था । प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे । इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा । यह समाचार द्वारपाल ने लगभग दौड़कर रावण तक पहुँचाया । स्वयं रावण उन्हें राजद्वार तक लेने आए । रावण को अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मै अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ । मैं वनवासी श्रीराम का दूत बनकर आया हूँ । उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहाँ है । रावण ने सविनय कहा – आप हमारे पितामह के भाई हैं, इस नाते आप हमारे पूज्य हैं । आप कृपया आसन ग्रहण करें । यदि आप मेंरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा । जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की । उन्होंने आसन ग्रहण किया । रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया । 
तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः कहाँ कि वनवासी श्रीराम ने तुम्हें प्रणाम कहा है । वे सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्वर-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं । 
*इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव महापंडित रावण को आचार्य पद पर वरण करने की इच्छा  प्रकट की है । मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ ।* 
रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया कि क्या श्रीराम द्वारा महेश्वर-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जारहा है ? 
बिल्कुल ठीक । श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है । जामवन्त बोले ।

प्रहस्त आँख तरेरते हुए गुर्राया – अत्यंत धृष्टता, नितांत निर्लज्जता । लंकेश्वर ऐसा प्रस्ताव कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे ।मातुल ! तुम्हें किसने मध्यस्थता करने को कहा ? लंकेश ने कठोर स्वर में फटकार दिया । जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है । क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दिया । 
लेकिन हाँ । यह जाँच तो नितांत आवश्यक है ही कि जब वनवासी राम ने इतना बड़ा आचार्य पद पर पदस्थ होने हेतु आमंत्रित किया है तब वह भी यजमान पद हेतु उचित अधिकारी है भी अथवा नहीं । 
जामवंत जी ! आप जानते ही हैं कि त्रिभुवन विजयी अपने इस शत्रु की लंकापुरी में आप पधारे हैं । यदि हम आपको यहाँ बंदी बना लें और आपको यहाँ से लौटने न दें तो आप क्या करेंगे ? जामवंत खुलकर हँसे । मुझे निरुद्ध करने की शक्ति समस्त लंका के दानवों के संयुक्त प्रयास में नहीं है, किन्तु मुझे किसी भी प्रकार की कोई विद्वत्ता प्रकट करने की न तो अनुमति है और न ही आवश्यकता । ध्यान रहे, मैं अभी एक ऐसे उपकरण के साथ यहां विद्यमान हूँ, जिसके माध्यम से धनुर्धारी लक्ष्मण यह दृश्यवार्ता स्पष्ट रूप से देख-सुन रहे हैं । जब मैं वहाँ से चलने लगा था तभी धनुर्वीर लक्ष्मण वीरासन में बैठे हुए हैं । उन्होंने आचमन करके अपने त्रोण से पाशुपतास्त्र निकाल कर संधान कर लिया है और मुझसे कहा है कि जामवन्त ! रावण से कह देना कि यदि आप में से किसी ने भी मेरा विरोध प्रकट करने की चेष्टा की तो यह पाशुपतास्त्र समस्त दानव कुल के संहार का संकल्प लेकर तुरन्त छूट जाएगा । इस कारण भलाई इसी में है कि आप मुझे अविलम्ब वांछित प्रत्युत्तर के साथ सकुशल और आदर सहित धनुर्धर लक्ष्मण के दृष्टिपथ तक वापस पहुँचने की व्यवस्था करें । 
उपस्थित दानवगण भयभीत हो गए । प्रहस्थ का शरीर पसीने से लथपथ हो गया । लंकेश तक काँप उठे । पाशुपतास्त्र ! महेश्वर का यह अमोघ अस्त्र तो सृष्टि में एक साथ दो धनुर्धर प्रयोग ही नहीं कर सकते । अब भले ही वह रावण मेघनाथ के त्रोण में भी हो । जब लक्ष्मण ने उसे संधान स्थिति में ला ही दिया है, तब स्वयं भगवान शिव भी अब उसे उठा नहीं सकते । उसका तो कोई प्रतिकार है ही नहीं । 
रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा – आप पधारें । यजमान उचित अधिकारी है । उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है । श्रीराम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया। 

जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे ।
जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी श्रीराम के पास क्या है और क्या होना चाहिए । अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना से समुद्र तट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है । यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है । तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं । विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना । ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी । अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना । 
स्वामी का आचार्य अर्थात् स्वयं का आचार्य । यह जान जानकीजी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया । 
स्वस्थ कण्ठ से सौभाग्यवती भव कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया ।सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरा । आदेश मिलने पर आना कहकर सीता को उसने विमान में ही छोड़ा और स्वयं श्रीराम के सम्मुख पहुँचा । 
जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे । सम्मुख होते ही वनवासी राम ने आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया । 
दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया । 
सुग्रीव ही नहीं विभीषण की भी उसने उपेक्षा कर दी । जैसे वे वहाँ हों ही नहीं ।भूमि शोधन के उपरान्त आचार्य रावण ने कहा कि यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें । 
श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं । 
अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं । यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था । इन सबके अतिरिक्त तुम सन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है । इन परिस्थितियों में पत्नी रहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ? 
कोई उपाय आचार्य ? आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं । स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं । 
श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया ।
श्री रामादेश के परिपालन में विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे । अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान । आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया ।

गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा लिंग विग्रह ? 
यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं । अभी तक लौटे नहीं हैं । आते ही होंगे । 
आचार्य ने आदेश दे दिया विलम्ब नहीं किया जा सकता । उत्तम मुहूर्त उपस्थित है । इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालुका-लिंग-विग्रह स्वयं बना ले । 
जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित की ।
 यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया । 
श्रीसीतारामने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया । आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया ।

अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की...
राम ने पूछा आपकी दक्षिणा? 
पुनःएक बार सभी को चौंकाया आचार्य के शब्दों ने - घबराओ नहीं यजमान !  स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती । आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है, लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य कि जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है ।आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे । आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी । 
ऐसा ही होगा आचार्य । यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी ।
 *रघुकुल रीति सदा चली आई । प्राण जाई पर वचन न जाई ।*
यह दृश्य वार्ता देख सुनकर सभी ने उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए । सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया । रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी ? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु श्रीराम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, व श्रीराम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है ? 
बहुत कुछ हो सकता था... काश ! श्रीराम को वनवास न होता...  काश ! सीता वन न जाती... किन्तु ये धरती तो है ही पाप भुगतने वालों के लिए और जो यहाँ आया है उसे अपने पाप भुगतने होंगे और इसलिए रावण जैसा पापी लंका का स्वामी तो हो सकता है देवलोक का नहीं । 
वह तपस्वी महापंडित रावण जिसे मिला था-ब्रह्मा से विद्वता और अमरता का वरदान... शिव भक्ति से पाया शक्ति का वरदान... 
चारों वेदों का ज्ञाता, ज्योतिष विद्या मे पारंगत, अपने घर की वास्तु शांति हेतु आचार्य रूप में जिसे-भगवन शंकर ने किया आमंत्रित... शिव भक्त रावण-रामेश्वरम में शिवलिंग पूजा हेतु अपने शत्रु प्रभु श्रीराम का जिसने स्वीकार किया निमंत्रण...

नवरात्रि पर्व उपवास

*नवरात्र‍ि में कर रहे हैं व्रत, तो सेहत को होंगे ये 8 फायदे* 
 
1 नवरात्रि में व्रत रखने पर ऐसे लोग भी जल्दी उठते हैं, जिन्हें रोजाना देर तक सोने की आदत होती है। लगातार 9 दिन तक ऐसा करने पर इसका असर आपके शरीर, ऊर्जा और मानसिक सेहत पर सकारात्मक रूप से पड़ता है।
2 व्रत के साथ पूजा-पाठ की जाती है, जो मानसिक शांति और तनाव कम करने में मददगार होता है। इससे आपका मानसिक स्तर सुधरता है, साथ ही आप प्रसन्न रहते हैं।
3 खाने पीने में परहेज करने का असर भी आपकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ता है। इन दिनों आप नमक और अन्य कैलोरी फूड नहीं खाते और फल, दूध एवं जूस का सेवन ज्यादा करते हैं जिससे आपका वजन नियंत्रित होता है।
4 फलाहार और तरल पदार्थों का सेवन पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है, जिसे आपको कब्ज, गैस और अपच जैसी समस्याओं से राहत मिलती है।
5 व्रत में आप शराब, सिगरेट एवं अन्य धूम्रपान संबधी चीजों का सेवन नहीं करते, जिससे आपकी बिगड़ती सेहत पर कंट्रोल होता है, और नुकसान से भी बचते हैं।
6 व्रत रखने से शरीर के अंदर से कोलेस्ट्राल की मात्रा कम होती है, जिससे आपकी बॉडी के साथ ही दिल और बाकी अंगों की फिटनेस बढ़ती है।
7 इन दिनों में तापमान अधिक होता है और प्यास भी ज्यादा लगती है। ऐसे में जब आप भरपूर पानी और तरल पदार्थों का सेवन करते हैं तो डिहाइड्रेशन नहीं होता और आप ज्यादा फ्रेश रहते हैं।
8 इन दिनों आप आध्यात्मिक होते हैं। आध्यात्‍म का आपकी मानसिक और आत्मिक सेहत में वृद्धि होती है और आपको अतिरिक्त ऊर्जा का एहसास होता है।

अपने पराए

एक  हृदयस्पर्शी  घटना 

सुबह सूर्योदय हुआ ही था कि  एक वयोवृद्ध डॉक्टर के दरवाजे पर आकर घंटी बजाने लगा।  सुबह-सुबह कौन आ गया? कहते हुए डॉक्टर की पत्नी ने दरवाजा खोला।
 वृद्ध को देखते ही डॉक्टर की पत्नी ने कहा,
 दादा आज इतनी सुबह?  क्या परेशानी हो गयी आपको? 
 वयोवृद्ध ने कहा मेरे अंगूठे के टांके कटवाने आया हूं ,डॉक्टर साहब के पास ।मुझे 8:30 बजे दूसरी जगह पहुंचना होता है, इसलिए जल्दी आया ।
सॉरी डॉक्टर ।
डाक्टर के पड़ोस वाले मोहल्ले में ही वयोवृद्ध का निवास था, जब भी जरूरत पड़ती वह डॉक्टर के पास आते थे ।इसलिए डाक्टर उनसे  परिचित था। उसने कमरे से बाहर आकर कहा ,
 कोई बात नहीं दादा ।बैठो ।
बताओ आप का अंगूठा ।
डॉक्टर ने पूरे ध्यान से अंगूठे के टांके खोले ,और कहा कि 
 दादा बहुत बढ़िया है। आपका घाव भर गया है ।फिर भी मैं पट्टी लगा देता हूं कि कहीं पर चोंट न पहुंचे ।
डाक्टर  तो बहुत होते हैं  परंतु  यह डॉक्टर  बहुत  हमदर्दी रखने वाले  आदमी का रखने वाले  और  दयालु थे 
डॉक्टर ने पट्टी लगाकर के पूछा 
 दादा आपको कहां पहुंचना पड़ता है 8:30 बजे ।आपको देर हो गई हो तो मैं चलकर आपको छोड़ आता हूं ।
वृद्ध ने कहा कि नहीं नहीं डॉक्टर साहब ,अभी तो मैं घर जाऊंगा ,नाश्ता तैयार करूंगा ,फिर निकलूंगा ,और बराबर 9:00 बजे पहुंच जाऊंगा ।
उन्होंने डॉक्टर का आभार माना और जाने के लिए खड़े हुए ।
बिल लेकर के उपचार करने वाले तो बहुत डॉक्टर होते हैं ,परंतु दिल से उपचार करने वाले कम होते हैं ।
दादा खड़े हुए तभी डॉक्टर की पत्नी ने आकर कहा कि दादा नाश्ता यहीं कर लो ।
वृद्ध ने कहा कि ना बेन। 
 मैं तो यहां नाश्ता यहां कर लेता ,परंतु उसको नाश्ता कौन कराएगा,
 डॉक्टर ने पूछा किस को नाश्ता कराना है ?
तब वृद्ध ने कहा कि मेरी पत्नी को ।
* तो वह कहां रहती है ?और 9:00 बजे आपको उसके यहां कहां पहुंचना है ?
 वृद्ध ने कहा -डॉक्टर साहब वह तो मेरे बिना रहती  ही नहीं थी ,परंतु अब। वह अस्वस्थ है ,
तो नर्सिंग होम में है ।
डॉक्टर ने पूछा -क्यों ,उनको क्या तकलीफ है ।वृद्ध व्यक्ति ने कहा,  मेरी पत्नी को अल्जाइमर हो गया है ,उसकी याददाश्त चली गई है ।
पिछले 5 साल से। वह मेरे को पहचानती नहीं है। मैं नर्सिंग होम में जाता हूं ,उसको नाश्ता खिलाता हूं ,तो वह फटी आंख से शून्य  नेत्रों से मुझे देखती है। मैं उसके लिए अनजाना हो गया हूं।
 ऐसा कहते कहते वृद्ध की आंखों में आंसू आ गए ।
डॉक्टर और उसकी पत्नी की आंखें भी गीली हो गई"।
याद रखें  
प्रेम निस्वार्थ होता है  ,प्रेम सब  के पास होता है  परंतु एक पक्षिय  प्रेम !यह दुर्लभ है ।पर होता हे जरूर ।
कबीर ने लिखा है  
प्रेम ना बाड़ी उपजे  ,प्रेम न हाट बिकाय ।
 बाजार में नहीं मिलता है  यह। 
डॉक्टर और उसकी  पत्नी ने कहा 
 दादा  5 साल से आप रोज नर्सिंग होम में उनको नाश्ता करने जाते हो  ?आप इतने वृद्ध।
 आप थकते नहीं हो ,ऊबते नहीं हो  ?
उन्होंने कहा कि  मैं  तीन बार जाता हूं  

डॉक्टर साहब  उसने जिंदगी में मेरी बहुत सेवा की और आज  मैं उसके सहारे जिंदगी जी रहा हूं  ।उसको देखता हूं  तो मेरा मन भर आता है ।    मैं  उसके पास बैठता हूं  तो मुझ में शक्ति आ जाती  है। अगर वह न होती  तो अभी तक मैं भी बिस्तर पकड़ लेता ,लेकिन  उसको ठीक करना है ,उसकी  संभाल करना है  ,इसलिए मुझ में रोज ताकत आ जाती है।  उसके कारण ही मुझ में इतनी फुर्ती है।  सुबह उठता हूं तो तैयार होकर के काम में लग जाता हूं  ।यह भाव रहता है कि उसको मिलने जाना है ,उसके साथ नाश्ता करना है, उसको नाश्ता कराना है  ।
उसके साथ नाश्ता करने का आनंद ही अलग है । मैं अपने हाथ से  उसको नाश्ता खिलाता हूं डॉक्टर ने कहा दादा एक बात पूछूं
 पूछो ना डॉक्टर साहब ।
डॉक्टर ने कहां दादा ,
वह तो आपको पहचानती नहीं ,न तो आपके सामने बोलती है, न हंसती है ,तो भी तुम मिलने जाते हो ।
तब उस समय  वृद्ध ने जो शब्द कहे ,वह शब्द दुनिया में सबसे अधिक हृदयस्पर्शी और मार्मिक हैं। 
 वृद्ध  बोले ,डॉक्टर साहब -वह नहीं जानती कि मैं कौन हूं ,पर मैं तो जानता हूं ना कि वह कौन है ।
और इतना कहते कहते हैं वृद्ध की आंखों से पानी की धारा बहने लगी। 
 डॉक्टर और उनकी पत्नी की आंखें भी भर आई ।
कहानी तो पूरी होगी परंतु पारिवारिक जीवन में स्वार्थ अभिशाप है ,और प्रेम आशीर्वाद है।
 प्रेम कम होता है तभी परिवार टूटता है ।
अपने घर में अपने माता पिता को प्रेम करना
 जो लोग यह कहते हैं अपने पिता के लिए कि साठी ,बुद्धि  न्हाटी,  उनको यह कथा 10 बार पढ़वाना ।
यह शब्द 
"वह नहीं जानती कि मैं कौन हूं परंतु मैं तो जानता हूं "
यह शब्द शायद परिवार में प्रेम का प्रवाह प्रवाहित कर दें। 

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*अपने वो नहीं, जो तस्वीर में साथ दिखे,*
*अपने तो वो है, जो तकलीफ में  साथ दिखे!*

❤️LOVE YOU ALL MY FAMILY MEMBERS AND PERENTS ❤️
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पीपल वृक्ष

पीपल के लाभ

1-अकेला ऐसा पौधा जो दिन और रात दोनो समय आक्सीजन देता है

2- पीपल के ताजा 5 पत्ते लेकर 500 ग्राम पानी मे डालकर 500 ग्राम रहने तक उबाले,ठंडा होने पर पिए ब्रर्तन स्टील और एल्युमिनियम का नहीं हो, आपका ह्रदय एक ही दिन में ठीक होना शुरू हो जाएगा

3- पीपल के पत्तो पर भोजन करे, लीवर ठीक हो जाता है

4-पीपल के सूखे पत्तों का पाउडर बनाकर आधा चम्मच गुड़ में मिलाकर सुबह दोपहर शाम खायेँ, किंतना भी पुराना दमा ठीक कर देता है

5-पीपल के ताजा 4-5 पत्ते लेकर पीसकर पानी मे मिलाकर पिलाये,1- 2 बार मे ही पीलिया में आराम देना शुरू कर देता है

6-पीपल की छाल को गंगाजल में घिसकर घाव में लगाये तुरंत आराम देता है

7-पीपल की छाल को खांड (चीनी )मिलाकर दिन में 5-6 बार चूसे, कोई भी नशा छूट जाता है

8-पीपल के पत्तों का काढ़ा पिये, फेफड़ो, दिल ,अमाशय और लीवर के सभी रोग ठीक कर देता है

7-पीपल के पत्तों का काढ़ा बनाकर पिये, किडनी के रोग ठीक कर देता है व पथरी को तोड़कर बाहर करता है

8-किंतना भी डिप्रेशन हो, पीपल के पेड़ के नीचे जाकर रोज 30 मिनट बैठिए डिप्रेशन खत्म कर देता है

9-पीपल की फल और ताजा कोपले लेकर बराबर मात्रा में लेकर पीसकर सुखाकर खांड मिलाकर दिन में 2 बार ले, महिलाओ के गर्भशाय और मासिक समय के सभी रोग ठीक करता है

10-पीपल का फल और ताजा कोपले लेकर बराबर मात्रा में लेकर पीसकर सुखाकर खांड मिलाकर दिन में 2 बार ले, बच्चो का तुतलाना ठीक कर देता है और दिमाग बहुत तेज करता है

11-जिन बच्चो में हाइपर एक्टिविटी होती है, जो बच्चे दिनभर रातभर दौड़ते भागते है सोते कम है, पीपल के पेड़ के नीचे बैठाइए सब ठीक कर देता है

12-कितना भी पुराना घुटनो का दर्द हो, पीपल के नीचे बैठे 30-45 दिन में सब खत्म हो जाएगा

13-शरीर मे कही से भी खून आये, महिलाओ को मासिक समय मे रक्त अधिक आता हो, बाबासीर में रक्त आता हो, दांत निकलवाने पर रक्त आये ,चोट लग जाये, 8-10 पत्ते पीसकर,छानकर पी जाएं, तुंरत रक्त का बहना बंद कर देता है

14-शरीर मे कही भी सूजन हो, दर्द हो, पीपल के पत्तों को गर्म करके बांध दे, ठीक हो जायेगे

Monday, September 28, 2020

ओशो महामारी के लिए क्या कहते हैं

*ओशो*(आचार्य रजनिश) गजब का *ज्ञान* दे गये, *कोरोना* जैसी *जगत बिमारी* के लिए

*70* के *दशक* में *हैजा* भी *महामारी* के रूप में पूरे *विश्व* में फैला था, तब *अमेरिका* में किसी ने *ओशो रजनीश जी* से प्रश्न किया
-"इस *महामारी* से कैसे  बचे ?"

*ओशो* ने विस्तार से जो समझाया वो आज *कोरोना* के सम्बंध में भी बिल्कुल *प्रासंगिक* है।

                       *ओशो*

"यह *प्रश्न* ही आप *गलत* पूछ रहे हैं,

*प्रश्न* ऐसा होना चाहिए था कि *महामारी* के कारण मेरे मन में *मरने का जो डर बैठ गया है* उसके सम्बन्ध में कुछ कहिए!

इस *डर* से कैसे बचा जाए...?

क्योंकि *वायरस* से *बचना* तो बहुत ही *आसान* है,

लेकिन जो *डर* आपके और *दुनिया* के *अधिकतर लोगों* के *भीतर* बैठ गया है, उससे *बचना* बहुत ही *मुश्किल* है।

अब इस *महामारी* से कम लोग, इसके *डर* के कारण लोग ज्यादा *मरेंगे*.......।

*’डर’* से ज्यादा खतरनाक इस *दुनिया* में कोई भी *वायरस* नहीं है।

इस *डर* को समझिये, 
अन्यथा *मौत* से पहले ही आप एक *जिंदा* लाश बन जाएँगे।

यह जो *भयावह माहौल* आप अभी देख रहे हैं, इसका *वायरस* आदि से कोई *लेना* *देना* नहीं है

ऐसा पहले भी *हजारों* बार हुआ है, और आगे भी होता रहेगा और आप देखेंगे कि आने वाले बरसों में युद्ध *तोपों* से नहीं बल्कि *जैविक हथियारों* से लड़ें जाएंगे।

🌹मैं फिर कहता हूं हर समस्या *मूर्ख* के लिए *डर* होती है, जबकि *ज्ञानी* के लिए *अवसर*!!
इस *महामारी* में आप *घर* बैठिए, *पुस्तकें पढ़िए*, शरीर को कष्ट दीजिए और *व्यायाम* कीजिये, *फिल्में* देखिये, *योग*  कीजिये और एक माह में *15* किलो वजन घटाइए, चेहरे पर बच्चों जैसी ताजगी लाइये
अपने *शौक़* पूरे कीजिए।

मुझे अगर *15* दिन घर  बैठने को कहा जाए तो में इन *15* दिनों में *30* पुस्तकें पढूंगा और नहीं तो एक *बुक* लिख डालिये, इस *महामन्दी* में पैसा *इन्वेस्ट* कीजिये, ये अवसर है जो *बीस तीस* साल में एक बार आता है *

☘ यह सिर्फ़ एक *सामूहिक पागलपन* है जो *अखबारों* और *TV* के माध्यम से *भीड़* को बेचा जा रहा है

*ओशो* कहते है...TV पर खबरे सुनना या *अखबार* पढ़ना बंद करें

ऐसा कोई भी *विडियो* या *न्यूज़* मत देखिये जिससे आपके भीतर *डर* पैदा हो...

*महामारी* के बारे में बात करना *बंद* कर दीजिए, 

*डर* भी एक तरह का *आत्म-सम्मोहन* ही है। 

एक ही तरह के *विचार* को बार-बार *घोकने* से *शरीर* के भीतर *रासायनिक* बदलाव  होने लगता है और यह *रासायनिक* बदलाव कभी कभी इतना *जहरीला* हो सकता है कि आपकी *जान* भी ले ले;

*महामारी* के अलावा भी बहुत कुछ *दुनिया* में हो रहा है, उन पर *ध्यान* दीजिए;

*ध्यान-साधना* से *साधक* के चारों तरफ  एक *प्रोटेक्टिव Aura* बन जाता है, जो *बाहर* की *नकारात्मक उर्जा* को उसके भीतर *प्रवेश* नहीं करने देता है, 
अभी पूरी *दुनिया की उर्जा* *नाकारात्मक*  हो चुकी  है.......

ऐसे में आप कभी भी इस *ब्लैक-होल* में  गिर सकते हैं....ध्यान की *नाव* में बैठ कर हीं आप इस *झंझावात* से बच सकते हैं।

*शास्त्रों* का *अध्ययन* कीजिए, 
*साधू-संगत* कीजिए, और *साधना* कीजिए, *विद्वानों* से सीखें

*आहार* का भी *विशेष* ध्यान रखिए, *स्वच्छ* *जल* पीए,

*अंतिम बात:*
*धीरज* रखिए... *जल्द*  ही सब कुछ *बदल* जाएगा.......

जब  तक *मौत* आ ही न जाए, तब तक उससे *डरने* की कोई ज़रूरत नहीं है और जो *अपरिहार्य* है उससे *डरने* का कोई *अर्थ* भी नहीं  है, 

*डर* एक  प्रकार की *मूढ़ता* है, अगर किसी *महामारी* से अभी नहीं भी मरे तो भी एक न एक दिन मरना ही होगा, और वो एक दिन कोई भी  दिन हो सकता है, इसलिए *विद्वानों* की तरह *जीयें*, *भीड़* की तरह  नहीं!!"

                    -:  *ओशो*  :-

भगत (भक्त )

(((((((((( पुरूषार्थ करो ))))))))))
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एक भगतड़ा था सब देवी देवताओं को मानता था और आशा करता था...
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मुझे कोई मुसीबत पड़ेगी तब देवी देवता मेरी सहायता करेंगे।
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शरीर से हट्टाकट्टा, मजबूत था।
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बैलगाड़ी चलाने का धन्धा करता था।
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एक दिन उसकी बैलगाड़ी कीचड़ में फँस गई।
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वह भगतड़ा बैलगाड़ी पर बैठा-बैठा एक-एक देव को पुकारता है कि-
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हे देव ! मुझे मदद करो। मेरी नैया पार करो। मैं दीन हीन हूँ। मैं निर्बल हूँ।
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मेरा जगत में कोई नहीं। मैं इतने वर्षों
में तुम्हारी सेवा करता हूँ...
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फूल चढ़ाता हूँ... स्तुति भजन गाता हूँ।
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इसलिए गाता था कि ऐसे मौके पर तुम मेरी सहायता करो।
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इस प्रकार भगतड़ा एक-एक देव को गिड़गिड़ाता रहा।
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अन्धेरा उतर रहा था। निर्जन और सन्नाटे के स्थान में कोई चारा न देखकर आखिर उसने हनुमान जी को बुलाया।
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बुलाता रहा.... बुलाता रहा....। बुलाते-बुलाते अनजाने में चित्त शान्त हुआ।
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संकल्प सिद्ध हुआ। हनुमान जी प्रकट हुए।
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हनुमान जी को देखकर बड़ा खुश हुआ।
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और सब देवों को बुलाया लेकिन किसी ने सहायता नहीं की।
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आप ही मेरे इष्टदेव हैं। अब मैं आपकी ही पूजा करूँगा।
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हनुमान जी ने पूछाः क्यों बुलाया है ?
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भगतड़े ने कहाः हे प्रभु ! मेरी बैलगाड़ी कीचड़ में फँसी है। आप निकलवा दो।
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पुरुषार्थमूर्ति हनुमान जी ने कहाः हे दुर्बुद्धि !
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तेरे अन्दर अथाह सामर्थ्य है, अथाह बल है। नीचे उतर। जरा पुरुषार्थ कर।
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दुर्बल विचारों से अपनी शक्तियों का नाश करने वाले दुर्बुद्धि !
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हिम्मत कर नहीं तो फिर गदा मारूँगा।
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निदान, वह हट्टाकट्टा तो था ही। लगाया जोर पहिए को।
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गाड़ी कीचड़ से निकालकर बाहर कर दी।
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हनुमान जी ने कहाः यह बैलगाड़ी तो क्या, तू पुरुषार्थ करे तो....
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जन्मों-जन्मों से फँसी हुई तेरी बुद्धिरूपी बैलगाड़ी संसार के कीचड़ से निकाल कर परम तत्त्व का साक्षात्कार भी कर सकता है,
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परम तत्त्व में स्थिर भी हो सकता है।

सुंदर पंक्तियां

Some beautiful lines 
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 "कुछ अरमान उन बारीश कि बुंदों कि तरह होते है,जिनको छुने कि ख्वाहिश में,हथेलिया तो गिली होजाती ,पर हाथ हमेशा खाली रह जाते है।"

"ज़िंदगी बड़ी अजीब होती है |
कभी हार कभी जीत होती है |
तमन्ना रखो समंदर की गहराई छूने की |
किनारों पे तो बस ज़िंदगी की शुरुवात होती है |"

इंसान की तरह बोलना न आये तो जानवर की तरह मौन रहना अच्छा है ..

जिस तरह बरसात आने से पहले छतरी खोलने का कोई अर्थ नही , उसी तरह काल्पनिक मुशिबतों के लिए पहले से ही चिंता करने का कोई मतलब नही ..

अन्त मे चार पंक्तियाँ दिल की गहराई से -

उसकी धाक ...., एक दो पर नहीं , सैकड़ो पे थी . और गिनती भी उसकी शहर के बड़े बड़ो में थी. दफ़न .... केवल छह फिट के गड्डे में कर दिया उसको , जबकि ...... जमीन उसके नाम तो कई एकड़ो में थी ..

आपका दिन मंगलमय हो

                               + धर्मेन्द्र +

सम्यक श्रम रजनीश

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*सम्यक श्रम*

सम्यक श्रम भी मनुष्य की चेतना और ऊर्जा को जगाने के लिए अनिवार्य हिस्सा है।

अब्राहम लिंकन एक दिन सुबह-सुबह अपने घर बैठा अपने जूतों पर पॉलिश करता था। उसका एक मित्र आया और उस मित्र ने कहा: लिंकन, यह क्या करते हो? तुम खुद ही अपने जूतों पर पॉलिश करते हो?

लिंकन ने कहा: तुमने मुझे हैरानी में डाल दिया। तुम क्या दूसरों के जूतों पर पॉलिश करते हो? मैं अपने ही जूतों पर पॉलिश कर रहा हूं। तुम क्या दूसरों के जूतों पर पॉलिश करते हो?

उसने कहा कि नहीं-नहीं, मैं तो दूसरों से करवाता हूं।

लिंकन ने कहा: दूसरों के जूतों पर पॉलिश करने से भी बुरी बात यह है कि तुम किसी आदमी से जूते पर पॉलिश करवाओ।

इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है कि जीवन से सीधे संबंध हम खो रहे हैं। जीवन के साथ हमारे सीधे संबंध श्रम के संबंध हैं। प्रकृति के साथ हमारे सीधे संबंध हमारे श्रम के संबंध हैं।

कनफ्यूशियस के जमाने में--कोई तीन हजार वर्ष पहले--कनफ्यूशियस एक गांव में घूमने गया था। उसने एक बगीचे में एक माली को देखा। एक बूढ़ा माली कुएं से पानी खींच रहा है। बूढ़े माली का कुएं से पानी खींचना बड़ा कष्टपूर्ण है। वह बुड्ढा लगा हुआ है पानी को...जहां बैल लगाए जाते हैं, वहां बुड्ढा लगा हुआ है और उसका जवान लड़का लगा हुआ है। वे दोनों पानी खींच रहे हैं! वह बूढ़ा बहुत बूढ़ा है।

कनफ्यूशियस को खयाल हुआ कि क्या इस बूढ़े को अब तक पता नहीं है कि बैलों या घोड़ों से पानी खींचा जाने लगा है। यह खुद ही लगा हुआ खींच रहा है। यह कहां के पुराने ढंग को अख्तियार किए हुए है।

तो वह बूढ़े आदमी के पास कनफ्यूशियस गया और उससे बोला कि मेरे मित्र! क्या तुम्हें पता नहीं है, नई ईजाद हो गई है। लोग घोड़े और बैलों को जोत कर पानी खींचते हैं, तुम खुद लगे हुए हो?

उस बूढ़े ने कहा: धीरे बोलो, धीरे बोलो! क्योंकि मुझे तो कुछ खतरा नहीं है, लेकिन मेरा जवान लड़का न सुन ले।

कनफ्यूशियस ने कहा: तुम्हारा मतलब?

उस बूढ़े ने कहा: मुझे सब ईजाद पता है, लेकिन सब ईजाद आदमी को श्रम से दूर करने वाली है। और मैं नहीं चाहता कि मेरा लड़का श्रम से दूर हो जाए। क्योंकि जिस दिन वह श्रम से दूर होगा, उसी दिन जीवन से भी दूर हो जाएगा।

जीवन और श्रम समानार्थक हैं। जीवन और श्रम एक ही अर्थ रखते हैं। लेकिन धीरे-धीरे हम उनको धन्यभागी कहने लगे हैं, जिनको श्रम नहीं करना पड़ता है और उनको अभागे कहने लगे हैं, जिनको श्रम करना पड़ता है! और यह हुआ भी। एक अर्थ में बहुत से लोगों ने श्रम करना छोड़ दिया, तो कुछ लोगों पर बहुत श्रम पड़ गया। बहुत श्रम प्राण ले लेता है, कम श्रम भी प्राण ले लेता है।

इसलिए मैंने कहा: सम्यक श्रम। श्रम का ठीक-ठीक विभाजन। हर आदमी के हाथ में श्रम होना चाहिए। और जितनी तीव्रता से और जितने आनंद से और जितने अहोभाव से कोई आदमी श्रम के जीवन में प्रवृत्त होगा, उतना ही पाएगा कि उसकी जीवन-धारा मस्तिष्क से उतर कर नाभि के करीब आनी शुरू हो गई है। क्योंकि श्रम के लिए मस्तिष्क की कोई जरूरत नहीं होती। श्रम के लिए हृदय की भी कोई जरूरत नहीं होती। श्रम तो सीधा नाभि से ही ऊर्जा को ग्रहण करता है और निकलता है।

थोड़ा श्रम, ठीक आहार के साथ-साथ थोड़ा श्रम अत्यंत आवश्यक है। और यह इसलिए नहीं कि यह किसी और के हित में है कि आप गरीब की सेवा करें तो यह गरीब के हित में है, कि आप जाकर गांव में खेती-बाड़ी करें, तो यह किसानों के हित में है, कि आप कोई श्रम करेंगे, तो बहुत बड़ी समाज-सेवा कर रहे हैं। 

झूठी हैं ये बातें। यह आपके हित में है और किसी के हित में नहीं है। किसी और के हित का इससे कोई संबंध नहीं है। किसी और का हित इससे हो जाए, वह बिलकुल दूसरी बात है, लेकिन यह आपके हित में है।

- ओशो, 
अंतर्यात्रा (ध्‍यान शिविर) प्रवचन-3

कीमत धर्म ग्रन्थों की

एक बूढ़ी माता मन्दिर के सामने भीख माँगती थी। एक संत ने पूछा - आपका बेटा लायक है, फिर यहाँ क्यों?

बूढ़ी माता बोली - बाबा, मेरे पति का देहान्त हो गया है। मेरा पुत्र परदेस नौकरी के लिए चला गया। जाते समय मेरे खर्चे के लिए कुछ रुपए देकर गया था, वे खर्च हो गये इसीलिए भीख माँग रही हूँ।

सन्त ने पूछा - क्या तेरा बेटा तुझे कुछ नहीं भेजता?

बूढ़ी माता बोलीं - मेरा बेटा हर महीने एक रंग-बिरंगा कागज भेजता है जिसे मैं दीवार पर चिपका देती हूँ।

सन्त ने उसके घर जाकर देखा कि दीवार पर 60 bank drafts चिपकाकर रखे थे। प्रत्येक draft ₹50,000 राशि का था। पढ़ी-लिखी न होने के कारण वह नहीं जानती थी कि उसके पास कितनी सम्पत्ति है। संत ने उसे draft का मूल्य समझाया।

उन माता की ही भाँति हमारी स्थिति भी है। *हमारे पास धर्मग्रन्थ तो हैं पर माथे से लगाकर अपने घर में सुसज्जित करके रखते हैं जबकि हम उनका वास्तविक लाभ तभी उठा पाएगें जब हम उनका अध्ययन, चिन्तन, मनन करके उन्हें अपने जीवन में उतारेगें*।

*हम  हमारे ग्रन्थों की वैज्ञानिकता को समझें,  हमारे त्यौहारो की वैज्ञानिकता को समझें और अनुसरण करें*  😌😌😌🙏🏻🙏🏻