प्रेम.......
प्रेम साधन भी है और साधनोँका फल (साध्य) भी।परमात्माकी ही भाँति प्रेमका स्वरुप भी अनिर्वचनीय है,गूँगे के स्वादकी तरह यह वाणीका विषय नहीँ होता।इसलिए प्रेमका स्वरुप अलौकिक बतलाया गया है;क्योँकि वह लोकसे सर्वदा विलक्षण है।लौकिक प्रेम भोग-कामनाओँ और दुर्वासनाओँसे वासित होनेके कारण शुद्ध नहीँ होता।
प्रेम साधन भी है और साधनोँका फल (साध्य) भी।परमात्माकी ही भाँति प्रेमका स्वरुप भी अनिर्वचनीय है,गूँगे के स्वादकी तरह यह वाणीका विषय नहीँ होता।इसलिए प्रेमका स्वरुप अलौकिक बतलाया गया है;क्योँकि वह लोकसे सर्वदा विलक्षण है।लौकिक प्रेम भोग-कामनाओँ और दुर्वासनाओँसे वासित होनेके कारण शुद्ध नहीँ होता।
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